लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या सत्ता का 'पीआर विंग'?
सत्ता की चौखट पर रीढ़विहीन पत्रकारिता: एक अस्तित्वगत संकट
आज पत्रकारिता का एक बड़ा धड़ा सूचना के लोकतंत्रीकरण के बजाय 'सत्ता के चारण' में तब्दील हो चुका है। चाटुकारिता का यह नया स्वरूप केवल एक नैतिक पतन नहीं, बल्कि उस सामाजिक अनुबंध (Social Contract) का खुला उल्लंघन है, जो प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनाता है। जब मीडिया जनहित के बजाय शासक वर्ग के 'पीआर विंग' की तरह काम करने लगे, तो वह पत्रकारिता नहीं, बल्कि मास-मैनिप्यूलेशन (Mass Manipulation) का औजार बन जाती है।
अमेरिकी पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक वॉल्टर लिपमैन ने अपनी कालजयी पुस्तक 'पब्लिक ओपिनियन' में आगाह किया था कि जब प्रेस तथ्यों को विकृत कर 'छद्म-माहौल' (Pseudo-environment) बनाने लगे, तो समाज का विवेक मर जाता है। नोम चोमस्की और एडवर्ड हरमन का 'प्रोपगैंडा मॉडल' आज के परिदृश्य पर सटीक बैठता है, जहाँ कड़े सवाल पूछने के बजाय 'सहमति का निर्माण' (Manufacturing Consent) मुख्यधारा के मीडिया का प्राथमिक व्यवसाय बन चुका है।
इतिहास गवाह है कि पत्रकारिता का गौरव हमेशा सत्ता से दूरी बनाए रखने में रहा है। वॉटरगेट घोटाले को बेनकाब करने वाले कार्ल बर्नस्टीन और बॉब वुडवर्ड हों, या वियतनाम युद्ध की ज़मीनी हकीकत दिखाने वाले वॉल्टर क्रोंकाइट इन दिग्गजों ने साबित किया कि पत्रकार का काम व्यवस्था को सहज करना नहीं, बल्कि उसे असहज करना है। भारतीय संदर्भ में गणेश शंकर विद्यार्थी ने कलम को कभी सत्ता की दासी नहीं बनने दिया, उन्होंने लिखा था कि "नस्लों को बदलने की ताकत कलम में है, बशर्ते वह बिकी न हो।"
ए़डमंड बर्क ने एडवर्ड केव की 'द जर्नलिस्ट्स गैलरी' को देखकर संसद में कहा था कि "यहाँ तीन एस्टेट बैठते हैं, लेकिन सामने की गैलरी में 'चौथा एस्टेट' (Fourth Estate) बैठा है, जो उन सब से अधिक महत्वपूर्ण है।" आज की चाटुकारिता इसी चौथे स्तंभ की बुनियाद को खोखला कर रही है। यदि पत्रकारिता अपनी मूल पहचान—'असहज करने वाले सच'—को छोड़कर केवल शासकों के एजेंडे को वैधता देने का साधन बनी रहेगी, तो इतिहास के पन्नों में इसे लोकतंत्र के रक्षक के रूप में नहीं, बल्कि उसके हत्यारे के रूप में दर्ज किया जाएगा।
कटघरे में खड़ा एक अकाट्य प्रश्न है जिसका उत्तर खोजना है:
"यदि हमारा कैमरा, हमारी कलम और हमारा प्राइम-टाइम केवल सत्ता की प्राथमिकताओं और उसके विरोधियों को लांछित करने में व्यस्त है, तो हम इतिहास को यह कैसे समझाएंगे कि हम जनता के प्रहरी (Watchdog) थे, या व्यवस्था के पालतू (Lapdog)?"
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