शीर्षक: जिंदा लाशों का विलाप
तुम जो रोज़ आईने में चेहरा देखते हो, क्या कभी उस चमड़ी के पीछे छिपी अपनी मृत आत्मा को भी टटोलने की हिम्मत की है ? यह सोचना कि तुम अपनी रीढ़विहीन शिथिलता, घिनौनी अनैतिकता, वासना और सड़े हुए स्वार्थ के गटर में तैरते हुए इस राष्ट्र का और खुद का विकास कर लोगे - यह इस सदी का सबसे बड़ा और वीभत्स मज़ाक है !
तुम राष्ट्रभक्त नहीं हो, तुम सिर्फ एक अवसरवादी परजीवी हो, जो इस देश की छाती से चिपककर उसका खून चूस रहा है !
जब तक तुम्हारी निजी सुख-सुविधाओं की थाली भरी है, तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहर कौम, समाज या देश किस आग में जल रहा है। तुम्हारी इस दुराग्रही और संकीर्ण मानसिकता पर आज मां भारती लज्जित है !
सुन लो ! जिन पूर्वजों ने अपनी हड्डियों को गलाकर और अपनी गर्दनों को कटवाकर यह आज़ाद आसमान तुम्हें सौंपा था, वे ऊपर से तुम्हारी इस नपुंसक और स्वार्थी जीवनशैली को देखकर रो रहे होंगे !
यदि तुम्हारे भीतर रत्ती भर भी मनुध्यता, प्रेम या राष्ट्र की चेतना बची है, तो अपनी इस सोई हुई अंतरात्मा को झकझोर कर जगाओ, वरना आने वाली नस्लें तुम्हें नागरिक नहीं, इस देश को दीमक की तरह चाटने वाला गद्वार कहेंगी !
उठो और अपनी इस घृणित मानसिकता पर पहले लज्जित होना सीखो, क्योंकि जिसके भीतर ग्लानि नहीं मरती, बस वही दोबारा जीवित हो सकता है !
आनंद शर्मा (कवि / लेखक)
👍
ReplyDeleteधरती जानती है सब कुछ वह वोह भी सबकुछ जानती है जिसे हम सब नहीं जानते हैं।
The determined people of this wonder land for prosperity, happiness and life with dignity to every individual
🧡🤍💚
बहुत-बहुत धन्यवाद
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