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Showing posts from May, 2026
                                                             काला अध्याय  इतिहास के पन्नों में एक ऐसा चेहरा भी दर्ज है, जिसे कुछ लोग 'संत' मानते हैं, तो कुछ 'आतंक का पर्याय' एक ऐसा नाम जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी और जिसकी गूंज आज भी खत्म नहीं हुई है। कौन था वह शख्स जिसने दिल्ली के तख्त को हिलाकर रख दिया था?  ​   शुरुआत होती है पंजाब के गांवों से। एक साधारण किसान का बेटा, जो धार्मिक ग्रंथों का प्रचारक बना। उसकी आवाज में एक अजीब सा जादू था जब वो बोलता था, तो लोग सम्मोहित हो जाते थे देखते ही देखते वह सिखों की एक बेहद प्रभावशाली संस्था, दमदमी टकसाल का मुखिया बन गया लेकिन कहानी यहाँ से बदलती है... ​1970 के दशक के आखिरी सालों में, पंजाब की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया। उस दौर की बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने इस 'धार्मिक प्रचारक' को अपने फायदे के लिए आगे बढ़ाया। मकसद था प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करना। लेकिन राजनीति क...
                               तपस्या और त्याग की भूमि पर स्वार्थ और शिथिलता  तपस्या और पुरुषार्थ की इस पुण्यभूमि पर आज चारों ओर जो शिथिलता का गर्त दिखाई दे रहा है, क्या वह हमें उद्वेलित नहीं करता ? हमारा वर्तमान आज अकर्मण्यता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है हम एक ऐसे विचित्र मोड़ पर खड़े हैं जहाँ राष्ट्र की युवा शक्ति, जो कभी संकल्पों का साक्षात् विग्रह हुआ करती थी, आज दिग्भ्रमित है, आत्म-विस्मृत है और व्यसनों के अंधकार में अपनी पहचान खो रही है !  हम इतिहास के पन्नों में पूर्ववर्ती सताओं की त्रुटियाँ खोजने में इतने लीन हो चुके हैं कि अपने ही आंगन में सुलगती हुई आग को देखने से कतरा रहे हैं। समता और स्वतंत्रता के नाम पर विकृतियों को स्वीकार किया जा रहा है। जिस समाज ने कभी मर्यादा को सर्वोपरि माना,आज उसी समाज के घरों में 'निजता' के छद्‌म आवरण में अपनों से ही सत्य को छुपाया जा रहा है,स्वतंत्रता के इस कुत्सित और बाजारीकृत स्वरूप ने हमारी सांस्कृतिक रीढ़ पर प्रहार किया है। यह शिथिलता, यह अकर्मण्यता कोई साध...
                                                 शीर्षक: जिंदा लाशों का विलाप तुम जो रोज़ आईने में चेहरा देखते हो, क्या कभी उस चमड़ी के पीछे छिपी अपनी मृत आत्मा को भी टटोलने की हिम्मत की है ? यह सोचना कि तुम अपनी रीढ़विहीन शिथिलता, घिनौनी अनैतिकता, वासना और सड़े हुए स्वार्थ के गटर में तैरते हुए इस राष्ट्र का और खुद का विकास कर लोगे - यह इस सदी का सबसे बड़ा और वीभत्स मज़ाक है ! तुम राष्ट्रभक्त नहीं हो, तुम सिर्फ एक अवसरवादी परजीवी हो, जो इस देश की छाती से चिपककर उसका खून चूस रहा है ! जब तक तुम्हारी निजी सुख-सुविधाओं की थाली भरी है, तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहर कौम, समाज या देश किस आग में जल रहा है। तुम्हारी इस दुराग्रही और संकीर्ण मानसिकता पर आज मां भारती लज्जित है ! सुन लो ! जिन पूर्वजों ने अपनी हड्डियों को गलाकर और अपनी गर्दनों को कटवाकर यह आज़ाद आसमान तुम्हें सौंपा था, वे ऊपर से तुम्हारी इस नपुंसक और स्वार्थी जीवनशैली को देखकर रो रहे होंगे ! यदि तुम्हारे ...