काला अध्याय

 इतिहास के पन्नों में एक ऐसा चेहरा भी दर्ज है, जिसे कुछ लोग 'संत' मानते हैं, तो कुछ 'आतंक का पर्याय' एक ऐसा नाम जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी और जिसकी गूंज आज भी खत्म नहीं हुई है। कौन था वह शख्स जिसने दिल्ली के तख्त को हिलाकर रख दिया था? 
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शुरुआत होती है पंजाब के गांवों से। एक साधारण किसान का बेटा, जो धार्मिक ग्रंथों का प्रचारक बना। उसकी आवाज में एक अजीब सा जादू था जब वो बोलता था, तो लोग सम्मोहित हो जाते थे देखते ही देखते वह सिखों की एक बेहद प्रभावशाली संस्था, दमदमी टकसाल का मुखिया बन गया लेकिन कहानी यहाँ से बदलती है...

​1970 के दशक के आखिरी सालों में, पंजाब की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया। उस दौर की बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने इस 'धार्मिक प्रचारक' को अपने फायदे के लिए आगे बढ़ाया। मकसद था प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करना। लेकिन राजनीति के जादूगर यह भूल गए कि कुछ जिन्न जब बोतल से बाहर आते हैं, तो वो आकाओं के काबू में नहीं रहते।
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देखते ही देखते, वह शख्स खुद एक समानांतर सरकार चलाने लगा। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर (Golden Temple), जो शांति का प्रतीक है, धीरे-धीरे हथियारों के जखीरे में तब्दील होने लगा। आदेश दिल्ली से नहीं, बल्कि परिसर के भीतर से जारी होने लगे। हिंसा का एक ऐसा दौर शुरू हुआ जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया।

​हालात इतने बेकाबू हो गए कि तत्कालीन प्रधानमंत्री को एक ऐसा कड़ा फैसला लेना पड़ा, जिसकी कीमत देश ने बाद में भारी त्रासदी के रूप में चुकाई। जून 1984 में भारतीय सेना को 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' को अंजाम देना पड़ा। टैंक और गोलियों की गड़गड़ाहट के बीच उस शख्स का अंत हुआ, लेकिन वो अपने पीछे एक ऐसा घाव छोड़ गया जो आज भी हरा है।

​राजनीति के मोहरे से लेकर कट्टरपंथ के चरम तक पहुँचने वाला, स्वर्ण मंदिर के अकाल तख्त से समानांतर सत्ता चलाने वाला और इंदिरा गांधी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने वाला वह विवादित चेहरा कोई और नहीं... जरनैल सिंह भिंडरावाले था। एक ऐसा नाम, जिसका इतिहास आज भी विवादों और सन्देह के घेरे में है।
                                                                                                                                                  आनंद शर्मा

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