तपस्या और त्याग की भूमि पर स्वार्थ और शिथिलता
तपस्या और पुरुषार्थ की इस पुण्यभूमि पर आज चारों ओर जो शिथिलता का गर्त दिखाई दे रहा है, क्या वह हमें उद्वेलित नहीं करता ?
हमारा वर्तमान आज अकर्मण्यता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है
हम एक ऐसे विचित्र मोड़ पर खड़े हैं जहाँ राष्ट्र की युवा शक्ति, जो कभी संकल्पों का साक्षात् विग्रह हुआ करती थी, आज दिग्भ्रमित है, आत्म-विस्मृत है और व्यसनों के अंधकार में अपनी पहचान खो रही है !
हम इतिहास के पन्नों में पूर्ववर्ती सताओं की त्रुटियाँ खोजने में इतने लीन हो चुके हैं कि अपने ही आंगन में सुलगती हुई आग को देखने से कतरा रहे हैं।
समता और स्वतंत्रता के नाम पर विकृतियों को स्वीकार किया जा रहा है।
जिस समाज ने कभी मर्यादा को सर्वोपरि माना,आज उसी समाज के घरों में 'निजता' के छद्म आवरण में अपनों से ही सत्य को छुपाया जा रहा है,स्वतंत्रता के इस कुत्सित और बाजारीकृत स्वरूप ने हमारी सांस्कृतिक रीढ़ पर प्रहार किया है।
यह शिथिलता, यह अकर्मण्यता कोई साधारण दोष नहीं है; यह एक प्रकार की वैचारिक दासता है ! हम सताओं के स्वार्थ, दलीय राजनीति और संकीर्ण व्यक्तिगत लाभ के पाश में इस प्रकार बंध चुके हैं
कि राष्ट्र-प्रथम का हमारा आदि-मंत्र कहीं खो गया है!
वन्दे मातरम् ! जयतु भारतम्!
आनंद शर्मा (लेखक / कवि)
This lethargy is not an eternal truth, but rather a chosen cowardice. If the youth of this sacred land fail to break the shackles of their ideological servitude even today, future generations will never forgive us for the fact that, while our home was burning, we merely sat amidst the heaps of ash, tallying the mistakes of our ancestors.
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